चुनावी चक्कलस में कार्यकर्ता…

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चुनावी चक्कलस में कार्यकर्ता…

चुनावी चक्कलस में कार्यकर्ता...
चुनावी चक्कलस में कार्यकर्ता… 

लोकसभा चुनाव चल रहे हैं, नेताओं की बदजुबानी सुर्खियाँ बटोर रही हैं। उम्मीदवार अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिये साम, दाम, दंड, भेद हर तिकड़म का सहारा ले रहा है। एक पार्टी दूसरे पार्टी को भला बुरा कह रही है। एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये जन्मकुंडली खंगाली जा रही हैं ताकि उम्मीदवार या उसके परिवार को नीचा दिखाकर उसका वोट काटा जा सके। लेकिन इन सबसे गेंडे जैसी मोटी खालवाले नेता लोग को कुच्छऊ भी फरक नही पड़ रहा है।
भाई जब इतना सारा बवाल काटा जा रहा है तो trueblitz.com ने सोंचा जिसकी कोई बात नही कर रहा है हम ही उसकी बात कर लेते है और वह है पार्टी का कार्यकर्ता।

दरअसल राजनीतिक बाज़ार में कार्यकर्ता वह प्राणी होता है जो अपनी जिंदगी की दूसरी जिम्मेदारियों को निभाते हुये अपनी पार्टी का छोटा से छोटा काम करता है जैसे गली गली घूमकर लोगो को पार्टी से जोड़ना, जनसभाओ की तैयारी में टाट बिछाना, कुर्सियाँ लगाना, पानी की व्यवस्था देखना, भोंगे का इंतेजाम करना इत्यादि, मतलब की हर वो छोटा काम जो पार्टी के बड़े नेता खुद करने से अपने आपको अपमानित महसूस करते हैं।

कार्यकर्ता अपनी रोजी रोटी कमाने, अपने परिवार के समय मे से समय निकालकर दिन रात इसलिये मेहनत में लगा होता है कि, उसका नेता चुनाव जीत जाये, पार्टी उसके काम को ध्यान में रखते हुये उसे सम्मानजनक पद दे। वह अपने मुहल्ले के लोगों का काम अपने जीते हुए नेता से करवा सके जिससे उसकी उसके पास पड़ोस में प्रतिष्ठा बढ़े। छोटे मोटे सरकारी काम उसे मिले और अंततः सबसे बड़ी हसरत होती है कि, उसे पार्टी का टिकट मिल जाये।

कार्यकर्ता बनना बिल्कुल भी आसान नही है। कार्यकर्ता को घर से लेकर बाहर तक बहुत कुछ झेलना पड़ता है। जैसे विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ताओं से दुश्मनी। दिनभर पार्टी के काम मे व्यस्त रहने की वजह से माँ बाप का विरोध और यदि कार्यकर्ता विवाहित है तो पत्नी के ताने और बच्चों के सवाल की पापाजी हमे समय क्यों नही देते। यही नही अगर पार्टी या पार्टी का नेता कोई गुनाह या गलती कर दे तो उनके बदले लोगों की टीका टिप्पणी और विरोध को भी सहता है।

बहुत बार तो ऐसा देखा जाता कि पार्टी के भीतर ही गुटबाजी होती है और उस गुटबाजी का सबसे पहला शिकार कार्यकर्ता ही होता है। एक गुट का नेता दूसरे गुट के कार्यकर्ता को ओछी नज़र से देखता है और उसके कामो को अपना बताकर उसे हमेशा नीचा गिराने की कोशिश करता है। इतना सब कुछ करने पर भी यदि कार्यकर्ता अपने हुक्मरानों के किसी निर्णय से अलग बात करे तो बाबा रे बाबा समझो कि वह पार्टीद्रोही और यहाँ तक कभी कभी विपक्षी पार्टी का दलाल तक घोषित कर दिया जाता है।

कार्यकर्ता हमेशा पार्टी में अपना भविष्य खोजते हुए जी-जान लगाकर मेहनत करता है लेकिन कदम कदम पर उसके साथ होनेवाला धोखा उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रहा होता है। अमूमन हम देखते है कि किसी भी शहर, गाँव कस्बों में सभी मौजूद नेताओं में से पाँच से दस नेता पैसे और बाहुबल से मजबूत होते हैं जो अलग अलग पार्टियों में घूम-घूमकर प्रशासन को अपने नियंत्रण में रखते हैं। जिस पार्टी की हवा चल रही होती है वह उसमे शामिल हो जाते हैं। चुनाव के समय अपनी वर्तमान पार्टी से टिकट ना मिलने की स्थिति में नेता रातों-रात अपनी विचारधारा बदलकर दूसरी पार्टी में आकर टिकट पाते हैं ऐसे नेताओं को आसमानी नेता कहा जाता है जो हेलीकाप्टर के माध्यम से उतरते है और टिकट भी प्राप्त कर लेते हैं। ठगा हुआ सा कार्यकर्ता टुकुर टुकुर देखता रह जाता है और कल तक वह जिसके विरोध में लड़ रहा था आज से वह मजबूरन उसकी जी हुजूरी में लग जाता है। एक चुनाव से लगातार वह मेहनत करता रहता है और दूसरा चुनाव आते आते उसके साथ धोखा हो जाता है, उसका टिकट कट जाता है। अगले फिर पाँच साल वह पार्टी के लिये काम करते गुजरता है, क्योंकि चुनाव लड़ने की उम्मीद उसके बुद्धि से नही निकलती।

वह दिन लद गये जब पार्टियाँ जमीनी कार्यकर्ता को टिकट दिया करती थीं। आजकल राजनीति देशसेवा कम दलाली और व्यापार ज्यादा बन गया है। इसलिये अब धर्म, जात, भाषा और प्रान्त के गणित पर पार्टीयों के टिकट बंटते हैं और उससे भी ऊपर बाहुबली और पैसे से धनाढ्य उम्मीदवार को वरीयता ज्यादा दी जाती हो भले ही उसे पार्टी में जुम्मा जुम्मा आये सात दिन भी ना हुये हों। अगर पार्टी कार्यकर्ता के पास पैसे और बाहुबल है तो उसका नंबर लग जाता है नही तो इक्का दुक्का गरीब कार्यकर्ताओ को छोड़कर बहुतायत मध्यमवर्गीय और गरीब कार्यकर्ता जीवनभर कार्यकर्ता बनकर रह जाते हैं।

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