मेट्रो प्रोजेक्ट ….आरे ….. और 18,000 बर्बाद परिवार

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मेट्रो प्रोजेक्ट ….आरे ….. और 18,000 बर्बाद परिवार

हम सभी आज अपनी नौकरी स्कूल कॉलेज और भी अन्य कामों के लिए जब घर से निकलते हैं तो हमारे घर वालों को यह पता नहीं होता कि हम घर वापस लौट आएंगे कि नहीं? ऐसा इसलिए क्योंकि घर से काम पर जाना यह किसी युद्ध से कम नहीं है।
जिन माध्यमों से आज हम सफर कर रहे हैं उससे एक बात तो तय है बढ़ती आबादी के कारण आने वाला कल बहुत ही भयावह होगा। सफर चाहे बस का हो यह ट्रेन का अगर आप एक टांग पर खड़े रहकर सफर कर लिए तो वह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।

आए दिन ट्रेन में सफर करते हुए पैसेंजर ट्रेन से गिरकर, कट कर उनकी मौत हो जाती है। एक न्यूज़ रिपोर्ट के अनुसार रोज 88 लोगों की ट्रेन से गिरकर मौत हो जाती है। एक वजह अगर लापरवाही है तो दूसरी वजह मौत होने का कारण ट्रेन में जगह न होना भी है जिसका पूरा श्रेय है बढ़ती आबादी को जाता है।

ठीक यही स्थिति आज महामार्ग की भी हो गई है। 10 मिनट का रास्ता अगर तय करना हो तो मंजिल पर पहुंचते-पहुंचते तो घंटो लग जाते हैं। बात अगर इमरजेंसी सर्विसेस की हो जैसे एंबुलेंस, पुलिस व्हेन, या फायर ब्रिगेड , मुश्किल घड़ी में सभी इमरजेंसी सुविधाएं का समय पर पहुंचना लगभग असंभव है। इमरजेंसी सेवा अगर समय पर न पहुंचे तो उस नरसंहार का दृश्य को शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल होगा।

महामार्ग पर बढ़ते ट्रैफिक जाम की समस्याओं से निवारण पाने हेतु मेट्रो एक सबसे अच्छा साधन दिख रहा है। मेट्रो प्रोजेक्ट आने से ट्रेन हो या बस इन पर बढ़ने वाला पब्लिक प्रेशर कुछ हद तक कम होगा। मेट्रो के आने से महमार्गो पर ट्रैफिक भी कुछ हद तक कम होंगे। सिर्फ इतना ही नहीं, ट्रेन से गिरकर मरने वालों का ग्राफ़ भी धीरे धीरे घटने लगेगा।

मेट्रो प्रोजेक्ट के कारण ऐसा कहा जाता है कि 2700 पेड़ काटे जाने वाली घटना वास्तव में गलत भी है। मगर मेट्रो प्रोजेक्ट नहीं बनने से कई परिवार तबाह हुए है और आगे और भी होंगे यह भी उतना ही सत्य है।

वैसे पेड़ को अत्याधुनिक तकनीकी प्रणाली से स्थलांतर भी किया जाता है। विदेशों में ऐसे कई पेड़ो को बचाया गया है। इस तकनीक से पेड़ बड़ी आसानी से बचाये जा सकते हैं। मगर 18,000 विध्वस्त परिवार के सदस्य फिर लौट पाएंगे ?

अब आम जनता इन दो मुद्दों में असमंजस में फस गई है की 2700 पेड़ जरूरी या 18,000 परिवार जो भीड़ के कारण ट्रेन से कटकर गिरकर मौत होती है। आखिर इन 18,000 परिवारों के दुख की सूद कोई सरकारी गैर सरकारी संस्था लेगा ?

 

Blog: Anonymous