सिक्स सिग्मा (6σ) और मुम्बई के डब्बावाले…

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सिक्स सिग्मा (6σ) और मुम्बई के डब्बावाले…

सिक्स सिग्मा (6σ) और मुम्बई के डब्बावाले…

सिक्स सिग्मा(6σ) एक नियमबद्ध, सांख्यिकीय आंकड़ों पर आधारित सतत सुधार की एक कार्यप्रणाली है। 1980 के दशक में बिल स्मिथ जो मोटोरोला कंपनी में नौकरी करते थे उन्होंने उत्पादन, गुणवत्ता बढ़ाने एवं उत्पादन के नुकसान को कम करने के लिये यह कार्यप्रणाली स्थापित की थी। सिक्स सिग्मा (6σ) को विस्तृत रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है; सिग्मा (σ) गुणवत्ता का पैमाना है। किसी भी उत्पादन की क्षमता, गुणवत्ता और किसी “दोष” या किसी भी गलती के परिणामस्वरूप ग्राहक के असंतोष की पहचान करने की प्रक्रिया है। सिग्मा (σ) इंगित करता है कि कितनी बार दोष होने की संभावना है और उच्च सिग्मा (σ) स्तर का मतलब कम दोष दर और कम दोष दर का अर्थ उच्च गुणवत्ता। सिक्स सिग्मा (6σ) को सफलतापूर्वक प्राप्त करने के की रणनीति को लागू करने के लिये मौलिक कदम उठाने होते हैं यह कदम हैं परिभाषित माप, विश्लेषण, सुधार, नियंत्रण और मानकीकरण।

सिक्स सिग्मा (6σ) की रणनीति व्यवसाय के पांच मूलभूत क्षेत्रों को प्रभावित करती है;

1. प्रक्रिया में सुधार
2. उत्पाद और सेवा में सुधार
3. ग्राहकों की संतुष्टि
4. डिजाइन पद्धति
5. आपूर्तिकर्ता सुधार

सिक्स सिग्मा (σ) ने मजबूत नेतृत्व, प्रशिक्षण, ग्राहक फोकस, परियोजना की शर्तों और संस्कृति परिवर्तन जैसे मानव तत्वों की वृद्धि के लिए मार्ग प्रशस्त किया है।

आपको बता दें कि सिक्स सिग्मा (6σ) का उदाहरण भारत मे ही मौजूद है और वो हैं मुम्बई शहर के डब्बावाले।
भारत मे गुणवान लोगो की कमी नहीं है इसलिये भारत मे साधारण भारतीयों का समूह जो दोपहर का भोजन घर से कार्यालय तक पहुँचाते हैं जिन्हें साधारणतः डब्बावाला कहा जाता है उन्होंने सिक्स सिग्मा (6σ) कार्यप्रणाली को अपने व्यवसाय में बखूबी ढाल लिया है। मुम्बई शहर में मेहनतकश डब्बावाले लगभग 2.5 लाख दोपहर के खाने का डब्बा घर से लेकर दफ्तर तक पहुँचाते हैं ताकि उन्हें ताजा और स्वादिष्ट घर का भोजन मिल सकेउस्के बाद वापस उनके घर तक खाली डब्बा उनके घर तक पहुँचाया जा सके।

यह काम बेहद ही कठिन होता है और इसमें किसी भी प्रकार का संगणीकृत तकनीक का उपयोग किये बिना 16 लाख बार मे से एक से भी कम गलती करके मुम्बई के डब्बावालों ने सिक्स सिग्मा (6σ) प्रणाली को अपने व्यवसाय में बखूबी उतारा है। मुम्बई में लगभग 5500 डब्बावाले लोकल ट्रेन, हाथ गाड़ी इत्यादि का उपयोग करके अपने कार्य को बिना किसी त्रुटि के करते हैं।
डब्बावाले काम कैसे करते हैं?
डब्बावाले घरों से एक विशेष प्रकार के कोड के साथ डब्बा इकट्ठा करते हैं
उनके दूसरे साथी एक ही जगह पर जानेवाले सभी डब्बों को एक साथ जमा करते हैं।
फिर तीसरे साथी द्वारा डब्बों को हाथगाडी और लोकल ट्रेन से डब्बों को उनके गंतव्य तक पहुँचाया जाता है।
सबसे अंत मे डब्बावाले डब्बा दफ्तर से पुनः उठाकर घर तक पहुँचाते हैं, या क्रम पहले वाले क्रम से ठीक उलट होता है।

डब्बावालों की सफलता का केवल एक ही सूत्र है उनके द्वारा तैयार किया गया कोडिंग सिस्टम और उसपर अमल वो भी बिना किसी संगणीकृत तकनीकी के इस्तेमाल के। कई वर्षों का अभ्यास ही है जो उन्हें सिक्स सिग्मा (6σ) को हर रोज अपनी कार्यप्रणाली में बिना किसी त्रुटि के उतारने में मदद करता है।

मुम्बई डब्बावालों की ख्याति केवल भारत भर में नही अपितु सात समंदर पार भी है। रिचर्ड ब्रानसन और इंग्लैंड के प्रिंस चार्ल्स उनके प्रशंसकों में शामिल हैं। ब्रिटिश प्रिंस चार्ल्स के पूर्वज भी डब्बावालों से अवगत रहे हैं क्योंकि, मुम्बई के डब्बावालों ने 1980 में ब्रिटिश और पारसी समुदाय को डब्बा पहुँचाना शुरू किया था। रास्ते बंद हो, मौसम खराब हो, चिलचिलाती धूप हो या बारिश डब्बावाले सेवा के लिये सदैव तैयार रहते हैं।

सन 2011 में डब्बावाले अपने 120 वर्षों की सेवा में पहली बार हड़ताल पर निकले श्री अण्णा हजारे को भ्रष्टाचार की विरुद्ध लड़ाई में साथ देने के लिये। IIM से लेकर हारवर्ड तक के लोगों ने डब्बावालों पर अभ्यास किया लेकिन डब्बावालों के इतने चर्चित होने के बावजूद उनकी माली हालत में कोई बहुत ज्यादा सुधार नही आई।
सन 2003 में ब्रिटिश राजकुमार चार्ल्स डब्बावालों से मिले लेकिन अनोखी बात यह थी कि, डब्बावालों ने उन्हें केवल 20 मिनट का समय दिया उससे ज्यादा समय डब्बावालों के पास नही था उन्हें आने ग्राहकों की सेवा करनी थी। सन 2005 में वर्जिन अटलांटिक के रिचर्ड ब्रानसन उनसे मिले और उनके बारे में जाना।
भारत मे 3 में से 2 व्यक्ति डब्बावाले थे जिन्हें सन 2005 में प्रिंस चार्ल्स की शादी में शामिल होने का निमंत्रण मिला था और उन 2 डब्बावालों के नाम है श्री रघुनाथ मेडगे और श्री स्वपन मोरे। उन्होंने प्रिंस चार्ल्स और उनकी होनेवाली पत्नी को पगड़ी एवं कोल्हापुरी साडी उपहार में देकर महाराष्ट्र की संस्कृति से अवगत कराया।
मुंबई के डब्बावालों ने सिक्स सिग्मा (6σ) को हासिल करने में बड़ी आर्थिक कुर्बानियाँ दी हैं उन्होंने हिंदुस्तान यूनिलीवर और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों को नकार दिया, लेकिन सन 2004 में उन्होंने चार वर्षों तक रेडियो मिर्ची के सुबह के कार्यक्रम का प्रचार करने में सहायता की।

सीख: सिक्स सिग्मा (6σ) जैसी महत्त्वपूर्ण कार्यप्रणाली को हासिल करने के लिये ईमानदारी की मेहनत, अभ्यास एवं लगन की आवश्यक्ता है, बड़े बड़े शिक्षण संस्थानों की डिग्री की कोई जरूरत नहीं है।

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